
रांची(RANCHI ):सियासत की डगर बोले या फिर इसके रास्ते की फ़िसलन रांची को बताए . यहां डग -डग पर इम्तिहान है, एक अग्निपथ है या फिर कहें अग्निपरीक्षा है. यहां संतुष्टी का भाव कभी नहीं रहता. हसरते कुछ और पाने की हिचकोले खाते रहती है . दरअसल, अगर देखा -समझा जाए तो यहां संभवानाओं की डगर पर सबकुछ चलता है. आपको बस कदम फूंक -फूंक कर और संभल -संभलकर आगे बढ़ना है. बाकी काम यह सियासत खुद ब खुद कर देती है .
झारखण्ड विधानसभा चुनाव की दहलीज पर पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन का हरा गमछा उतारना और भगवा पट्टा धारण करना एक बड़ी सियासी उठा -पटक और चकराने वाला कदम झारखण्ड की राजनीति में लेकर आया… चंपाई सोरेन के पीछे लोबिन हेंब्रम भी भाजपा में शामिल हो गए..झारखंड के बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ,प्रदेश सह प्रभारी हिमंत विश्वा सरमा सहित पार्टी के अन्य बड़े नेताओं के समक्ष लोबीन ने भगवा पट्टा धारण कर लिया..खुद ये भगवा चंपई ने पहनाया.

मौज़ूदा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए यह सिर्फ झटका नहीं है, बल्कि उनकी कार्यशैली और कुर्सी की खातिर उनका बेपनाह प्यार का ही नतीजा है. तब ही इतना बड़ा बिखराव और टूट हुआ.कोई कुछ भी आकलन करें, लेकिन हकीकत की जमीन पर तो यह एक सच्चाई है और जिसे झूठलाया नहीं जा सकता. यहां परिवारवाद के छींटे भी दामन पर लग रहें है और लानत -मलामात भी विपक्ष खूब कर रहा है. खैर अगर समझा जाए तो यही राजनीति है और इसके रंग -बिरंगे रंग. जो हर मौसम में अपना सत्ता को साधने के लिए रंग बदलते रहती है. यहां कोई सगा -पराया और दोस्त -दुश्मन नहीं होता. सियासत अपने हिसाब से सभी को चलाते रहती है.
अभी गहमा-गहमी और सरगर्मियां इस बात को लेकर शांत हो गई है कि अंतिम तौर पर चंपाई सोरेन ने भगवा झंडा थामकर अपने राजनीतिक जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला कर लिया. वो भी उस पार्टी में जहां उन्हें एकबार फिर खुद को स्थापित करना है और झारखण्ड और कोल्हान की जनता को बताना है कि, आखिर उनकी अहमियत और कद क्या है?
सवाल सपाट और सीधा है, आखिर चंपाई सोरेन भाजपा से जुड़े है, तो फिरआखिर उनका रोल क्या होगा ? इसके साथ ही जिस मकसद के साथ वो कमल फूल हाथ में पकड़े है और अगर वो आकांक्षाए भगवा पार्टी के लिए पूरी नहीं कर सके तो फिर भाजपा आगे उनकी बेहतरी के लिए क्या करेगी? सवाल सो टके का ये भी है कि लोकसभा चुनाव में सीता और गीता यानि सीता सोरेन जेएमएम और गीता कोड़ा कांग्रेस छोड़कर आई थी. लेकिन, लोकसभा चुनाव में इस पलटी पर दोनों को जनता ने नजरअंदाज कर दिया और हार का मुंह देखना पड़ा.उनकी हसरते दिल्ली जाने की पूरी नहीं हो सकी. आज दोनों चुपचाप और टकटकी लगाए हुए है कि पार्टी उन्हें अब कौन सी जिम्मेदारी सौपेगी ?
चंपाई सोरेन तो मुख्यमंत्री से हटने के बाद भी मंत्रीपद पर काबिज थे और अगर जेएमएम विधानसभा चुनाव जीतती तो भी तय था कि उन्हें मंत्री तो जरूर बना ही दिया जाता. अगर हेमंत सोरेन की सरकार नहीं भी बनती तो भी उनकी खैरियत में कमी नहीं होती, क्योंकि यहां उनके लिए एक खुला और मन माफिक मैदान होता, जहां रोकटोक न के बराबर ही रहती. लेकिन, इस सियासी करवट पर चंपाई दा ने एक बड़ा जोखिम लिया हैं, जहां चुनौतियों के साथ ही एक अग्निपरीक्षा भी उनके सियासी करियर की है.
सवाल ये भी सिर उठाएगा कि कोल्हान टाइगर के नाम से मशहूर चंपाई सोरेन की इस यकायक पालाबदल को कोल्हान की जनता और उनके चेहते कैसे लेते हैं?. क्या वाकई उनका वोटबैंक जेएमएम से भाजपा में शिफ्ट होगा?. इसके साथ ही उनके हमसफर भी इस दरमियान कोई बड़े नेता होंगे. याद रहें चंपाई सोरेन सरायकेला से छह बार विधायक बने हैं, लेकिन जीत का अंतर विशाल नहीं रहा हैं. भाजपा प्रत्याशी से जोरदार टक्कर मिली हैं. उनके बीजेपी में आने से सरायकेला भाजपा के कार्यकर्त्ता और चुनाव लड़ने की सोच रहें प्रत्याशी का रुख क्या होगा? ये भी एक मायने वाली बात होगी.
सवालों की फेहरिश्त में सवाल ये भी है कि आदिवासी संथाल नेता चंपाई सोरेन एक सीधे -साधे राजनेता रहे है और उनका भोलापन और जमीनी लगाव सबको अपनी और खींचता हैं. वे आदिवासी, मूलवासी, मजदूर और गरीबों की आवाज जोर -शोर से मुखर करते रहे हैं. झारखण्ड अलग राज्य के लिए जंगलों -पहाड़ों की खाक दिन -रात छानी है. आंदोलन में तपे -तपाए एक ख़ालिस जमीनी नेता हैं. जिनके तजुर्बे और लंबे सियासी सफ़र को नजरअंदाज तो नहीं किया जा सकता.
पर सच्चाई को टटोले तो जो रुतबा और मान जेएमएम में चंपाई दा का था यानि तक़रीबन उनकी हैसियत शिबू सोरेन के बाद नंबर दो की तो थी ही, क्योंकि अगर ऐसा नहीं होता तो मुख्यमंत्री के लिए नहीं चुने जाते. जबकि,इसके उलट उनके लिए भाजपा में माहौल उतना साजगार और सदाबहार शायद ही रहने वाला है. इसके पीछे वजह ये है कि भाजपा में एक से एक दिग्गज नेता भरे पड़े है, जिसमे बाबूलाल मरांडी, अर्जुन मुंडा,अमर बावरी, सीता सोरेन, निशिकांत दुबे हैं. जो पहले से ही अपनी फील्डिंग टाइट किए हुए हैं. इनकी मौज़ूदगी में आखिर उनकी जगह क्या होगी? वो अपने आप को कैसे ढाल और कितना निखार पाते हैं, ये भी बताना और साबित करना एक चुनौती होगी?
आत्मसम्मान को लगी ठोकर और चोट से मिले जख्म के बाद ही चंपाई सोरेन मर्माहत हो गए, लाजमी हैं कि दर्द जब से हद से ज्यादा गुजर गई तब ही भाजपा में जाने का कदम उठाया. जोखिम भरा कदम तो चंपाई ने उठाया, लेकिन इसकी राहों में कशमकश भी है और कांटे भी है. अगर वो यहां मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हो जाते है, तब तो ये मान लिया जायेगा, उनकी पलटी और पाला बदल की पहल साकार हो गई. अगर ये भी नहीं हुआ तो भाजपा अगर रघुवर दास की तरह चंपाई को भी कही का राजयपाल बना देती है तो भी उनका कदम कामयाबी का माना जायेंगे.
अगर ऐसा नहीं हो पाता है तो फिर उनके लिए वक़्त के साथ खुद को साबित तो ये करना पड़ेगा कि उनकी कीमत क्या है. और क्यों उनका इतना भाव हैं कि उनके हटने से झारखण्ड मुक्ति मोर्चा डगमगा गई.
आगामी विधानसभा चुनाव में कोल्हान टाइगर को कोल्हान प्रमंडल की 14 सीटों पर अपना वजूद दिखाना होगा, क्योंकि इन सीटों पर पिछले 2019 के विधानसभा चुनाव में भगवा झंडा कहीं नहीं फहर सका था. बीजेपी एक भी सीट नहीं जीत सकी थी. चंपाई सोरेन के आने से शायद ये सूखा ख़त्म हो और कमल फूल खिले.
आखिर में सुलगता और गंभीर सवाल ये है कि इस बदलाव से किसको फायदा होगा? . तो इसका जवाब यही है कि चंपाई के सियासी करियर की एक बड़ा इम्तिहान है. जबकि, भाजपा के लिए तो दोनों हाथ में लड्डू ही होंगे. क्योंकि उन्होंने कोल्हान के एक बड़े लीडर को अपने पाले में कर लिया है. अगर चंपाई चलते है तो उसके लिए लाभ ही होगा और अगर उनका दांव नहीं चल पाता है तो भी उसके वोट बैंक पर असर तो नहीं होगा. कुलमिलाकर चंपाई सोरेन का राजनीतिक भविष्य ही यहां पर उम्र के इस मुहाने पर दांव पर लगा होगा.
खैर आगे क्या होगा, ये समय और आगामी विधानसभा चुनाव इसकी तस्दीक कर देगी , खासकर कोल्हान की 14 सीट की तस्वीर क्या होगी? ये बहुत हद तक कोल्हान टाइगर का भविष्य भी तय करेगी. तब तक हमे इंतजार ही करना चाहिए.
NEWS ANP के लिए रांची से शिवपूजन सिंह के साथ कुंवर अभिषेक सिंह की रिपोर्ट
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