धनबाद(DHANBAD): मजदूर हितकारी नीति की पुनः बहाली बिंदेश्वरी दुबे जी को सच्ची श्रद्धांजलि एवं समय की मांग।
आज भी जब उद्योग जगत में मजदूर यूनियन, श्रमिकों की मांग, आदर्शवादी चरित्र और परिपाटी की बात आती है, तब स्वतः ही स्व. बिंदेश्वरी दुबे का वर्णन प्रमुखता से होता है। स्व. दुबे महान पारदर्शी, कुशल प्रशासक, श्रमिकों के हमदर्द, उदारवादी एवं सर्वमान्य विचारक थे। उन्होंने श्रमिकों सहित समाज के दबे कुचले लोगों के लिए सतत संघर्ष किया।
श्रमिक आंदोलन से बिहार के मुख्यमंत्री तथा विधि एवं न्याय तथा श्रम मंत्री, भारत सरकार बनने तक का सफर पंडित दुबे जी की दृढ़ इच्छाशक्ति, त्याग एवं ईमानदारी का उपयुक्त उदाहरण है। वे छात्र जीवन में ही महात्मा गांधी और पंडित नेहरू से प्रभावित होकर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े और इसके पश्चात जन-मानस की सेवा हेतु अपना जीवन समर्पित करते हुए महात्मा गांधी-जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी तथा राजीव गांधी तक का साथ दिया।
बिन्देश्वरी दुबे (१४ जनवरी, १९२१ – २० जनवरी, १९९३) एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, कुशल प्रशासक एवं गरीब और श्रमिकों के हमदर्द और मसीहा थे जो बिहार के मुख्यमंत्री, केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री (कानून एवं न्याय तथा श्रम एवं रोजगार), इंटक के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। इंदिरा जी की सलाह पर बिहार प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष बने और अपने अध्यक्ष कार्यकाल के दौरान लोकसभा चुनाव में शत प्रतिशत और विधानसभा चुनाव में ९१ प्रतिशत कांग्रेस के पक्ष में परिणाम के साथ सूबे के मुख्यमंत्री बने।
मुख्यमंत्री के रूप में इनका कार्यकाल आदर्श के रूप में दर्ज है। जब इन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने की राजनीति हुई, तब नेता प्रतिपक्ष कर्पूरी ठाकुर ने कांग्रेस अध्यक्ष स्व. राजीव गांधी से दुबे जी को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाए जाने के लिए मिलकर व्यक्तिगत तौर पर अनुरोध किया था। इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि विरोधी भी इनकी खूबियों, ईमानदार चरित्र और निष्काम कर्म से प्रभावित होकर इनकी प्रशंसा मुक्त कंठ से करते रहे हैं।
इससे पूर्व ये अखंड बिहार सरकारों में भी शिक्षा, परिवहन, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री रहे। १९८० से १९८४ तक सातवीं लोकसभा (गिरिडीह) के सदस्य, १९८८ से १९९३ तक राज्यसभा के सदस्य, बोकारो जिले के बेरमो से छह बार तथा बक्सर जिले के शाहपुर से एक बार विधानसभा के सदस्य रहे।
बिन्देश्वरी दुबे का जन्म बिहार के भोजपुर जिले के ‘महुआँव’ नामक ग्राम में ‘दुबे टोला’ के एक साधारण कृषक परिवार में हुआ था। इनके माता-पिता, जानकी देवी एवं शिव नरेश दुबे थे। चार भाईयों के बीच यह दूसरे स्थान पर थे।
संत माईकल विद्यालय, पटना मेंk मेट्रिक एवं साइंस कॉलेज, पटना में हाईयर सेकेंडरी करने के बाद इन्हें बिहार कॉलेज ऑफ़ इंजीनियरिंग (अभी का एन•आई•टी, पटना) में दाखिला मिला। इन्होंने अंतिम साल में इंजीनियरिंग की पढ़ाई छोड़ दी और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए।
बिन्देश्वरी दुबे ने स्वतंत्रता आंदोलन के ही दौरान १९४४ में जेल से छूटने के बाद बेरमो में हिंद स्टिफ माइंस में नौकरी की। वे कोलियरियों में प्रबंधन के समक्ष मजदूरों के शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाने लगे। सर्वप्रथम् उन्होंने ट्रेड यूनियन की शुरुआत एक ब्रिटिश मैनेजर द्वारा चलाई जा रही ‘सर लिन्सन पैकिन्सन ऐन्ड कं.’ से शुरु की। तत्पश्चात उस समय के बड़े मजदूर नेता बिन्देश्वरी सिंह ने आम सभा में जनता द्वारा चुने जाने पर उन्हें कोलियरी मजदूर संघ की शाखा का अध्यक्ष नियुक्त किया था। इसके पश्चात यह निरंतर मजदूर हितों के लिए लगे रहे और समयकाल में बिहार इंटक के अध्यक्ष बने।
८० के दशक में धनबाद में इन्हें इंटक का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था, जिस अधिवेशन का उद्घाटन तत्कालीन् प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी ने किया था। इसके अलावा इंटक से संबद्ध इंडियन नेश्नल माईनवर्कर्स फ़ेडेरेशन, राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ, इंडियन एलेक्ट्रिसिटी वर्कर्स फ़ेडेरेशन, माईन्स वर्कर्स एकाडेमी, एच•एस•सी•एल• वर्कर्स यूनियन, पी•पी•सी•एल• वर्कर्स यूनियन, बोकारो स्टील वर्कर्स यूनियन, टेल्को वर्कर्स यूनियन, डी•वी•सी• वर्कर्स यूनियन, एच•ई•सी• वर्कर्स यूनियन, मेकॉन वर्कर्स यूनियन इत्यादि अनेकों यूनियनों के अध्यक्ष रहे।
‘इंटक’ से संबद्ध ‘राष्ट्रीय कोलियरी मजदूर संघ’, जो पहले ‘कोलियरी मजदूर संघ’ कहलाता था, के दुबे निर्विवाद नेता थे। १९५० और ६० के दशक में संघ के संगठन मंत्री, मंत्री, उपाध्यक्ष और फिर राष्ट्रीय महामंत्री बनने के बाद १९७० के दशक में अध्यक्ष भी बने और अंतिम साँस तक (२० जनवरी, १९९३) इस पद का कर्त्तव्य निर्वाहन किया। २४ अक्तूबर, १९६२ को दुबे जी की अध्यक्ष्ता में डी•वी•सी• कोलियरी में केन्द्रीय श्रम विभाग के पार्लियामेन्ट्री सेक्रेटरी श्री आर• एल• मालवीय के हस्तक्षेप पर ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगा दी गई। ऐसा किसी सरकारी कोलियरी में पहली बार हुआ था। १९६२-६३ में ही पद्मा महाराज की ढोरी कोलियरी में भी बिन्देश्वरी दुबे की पहल पर ठेकेदारी प्रथा को समाप्त कर दिया गया।
१७ जून १९६८ को राष्ट्रीय खान मजदूर फ़ेडरेशन के महामंत्री कांती मेहता और कोलियरी मजदूर संघ के महामंत्री बिन्देश्वरी दुबे की अपील पर वेतन मंडल की सिफ़ारिशों को सही ढंग से लागू कराने तथा मजदूरों को महंगाई भत्ता दिलाने के लिए ऐतिहासिक हड़ताल हुई थी जिसमें तत्कालीन बिहार के धनबाद एवं हजारीबाग जिले के करीब डेढ़ लाख कोलियरी मजदूर घनघोर बारिश में हड़ताल पर रहे। बिहार, बंगाल, उड़ीसा आदि की करमचंद थापर, चंचनी, बर्ड, के• बोरा, टर्नर कोरिशन, न्यू तेतुलिया, बैजना, मधुबन, अमलाबाद, पुटकी, कनकनी, बागडीगी, लोदना, भौंरा, बसताकोला, रानीगंज जैसी कोलियरियों को भुगतान नहीं करने पर हड़ताल की नोटिस दी गई जिसके फलस्वरूप उनके साथ समझौता हो गया। इनके धारदार संगठन और ईमानदार आंदोलन के आगे सभी बड़े राजा-महाराजाओं और पूंजीपतियों की कंपनीयाँ को झुकना पड़ा।
पं. बिंदेश्वरी दुबे ने कोयला मजदूरों की आवाज़ को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी और तत्कालीन कोयला मंत्री मोहन कुमारमंगलम के साथ मिलकर भारत की कोलियरियों के राष्ट्रीयकरण में अहम् भूमिका निभाई। सर्वप्रथम् धनबाद के कोकिंग कोल कोलियरियों का राष्ट्रीयकरण हुआ था। बिन्देश्वरी दुबे ने मजदूरों की समस्याओं को और करीब से समझने और उसके निदान के लिए अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के कई सारे सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए कई देशों जैसे अमेरिका, जर्मनी, यू•के•, बेल्जियम, नीदरलैंड, फ़्रांस, युगोस्लाविया, स्वीट्ज़रलैंड, जापान इत्यादि का दौरा किया।
डी.वी.सी की सारी इकाईयों जैसे माईथन, तेनुघाट-ललपनिया, कोडरमा एवं विभिन्न परियोजनाओं की स्थापना में इन्होंनें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और विभिन्न मुद्दों पर जनता और सरकार के बीच कड़ी का काम किया। इन्होंने अनेक औद्योगिक संयंत्रों या परियोजनाओं मुख्यतः बोकारो स्टील प्लांट, डी.वी.सी, कोल इंडिया और टाटा स्टील में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी सेवा में क्षेत्र के विस्थापितों और मूलवासियों के लिए शत प्रतिशत आरक्षण के नियम बनाए थे।
देश भर के कोलियरियों और इस्पात संयंत्रों में स्व. दुबे का यूनियन स्वीकृत और मान्यता प्राप्त था। इनके साथ देशभर के विभिन्न कल-कारखानों में जिस प्रकार इन्होंने मजदूर हित में ठोस कदम उठाए वह अविस्मरणीय है। वर्तमान के कद्दावर यूनियन नेता भी स्व. दुबे के विराट व्यक्तित्व और प्रभाव के सामने नगण्य हैं।
झारखंड राज्य निर्माण और आदिवासी समाज के कल्याण में इनकी अहम भूमिका रही। राजनीतिक हल्के में शिबू सोरेन को इनका पोष-पुत्र कहा जाता रहा है।
लोक-अदालत, आधार, रंगदारी के खिलाफ कानून, पत्रकारों को पेंशन, राष्ट्रीय लॉ विश्वविद्यालय की स्थापना एवं अन्य कई महत्वपूर्ण पक्षों से संबंधित कानूनी प्रस्तावना एवं संशोधन इनके द्वारा केंद्रीय कानून मंत्री और केंद्रीय श्रम मंत्री के रूप में किए गए।
जिन मजदूर हितकारी कानूनों को पं. बिंदेश्वरी दुबे द्वारा लागू एवं संरक्षित किया गया, जिनमें से २०१९-२० में केंद्र सरकार द्वारा वर्तमान के ४४ मजदूर कानूनों के जगह पर ४ संहिता लागू किया गया, लेकिन यह संहिताएं यह परिभाषित करने में विफल हैं कि अधिकांश कार्यालय और सेवा प्रतिष्ठानों में सुरक्षा, स्वास्थ्य और कामकाजी परिस्थितियों से संबंधित बहुत ही मामूली चिंताएँ हैं।
इसने खतरनाक और गैर-खतरनाक प्रतिष्ठानों के बीच कोई अंतर नहीं किया और सभी को एक ही अनिवार्य पंजीकरण के अधीन कर दिया, जो कदापि स्वीकार करने योग्य नहीं है।
इन्हीं संहिताओं के तहत कारखानों के कार्य शेड्यूल को ९ से १२ घंटे तक बढ़ाने और महिला श्रमिकों को रात की पाली में काम करने की अनुमति कुछ राज्यों द्वारा दी गई है, जिससे मजदूरों के स्वास्थ्य और कार्य क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ेगा।
अतः यह परम आवश्यक है कि, हितकारी नीति एवं कानूनों को पुनः बहाल कराने के लिए आंदोलित मजदूर अपने एकता की ताकत से सरकार को बाध्य कर सके। यही पं. बिंदेश्वरी दुबे को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

सौजन्य..शिवाशीष चौबे (दौहित्र एवं विधिक उत्तराधिकारी – स्व. बिंदेश्वरी दुबे)
NEWS ANP के लिए कुंवर अभिषेक सिंह की रिपोर्ट..
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