बस कंडक्टर रहते हुए राधाकृष्ण ने लिखी थी कहानियां : रणेन्द्र, निदेशक, डॉ. रामदयाल मुंडा, जनजातीय कल्याण शोध

रांची(RANCHI) किताब उत्सव के पांचवें दिन ‘हमारा झारखंड हमारा गौरव’ सत्र में झारखंड के गौरव विचारक-कथाकार राधाकृष्ण को याद किया गया। इस सत्र में इतिहासकार प्रो. इंद्र कुमार चौधरी और आलोचक अशोक प्रियदर्शी जी ने उनके जीवन और व्यक्तित्व पर वक्तव्य दिया।

इस सत्र में डॉ. राम दयाल मुंडा जनजातीय शोध कल्याण संस्थान के निदेशक रणेन्द्र ने सबका स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी अदब के लेखक प्रेमचंद भी राधाकृष्ण की अफसाना निगारी से मुतासिर थे। एक बस कंडक्टर रहते हुए राधाकृष्ण ने जो कहानियां लिखी वो हिंदी अदब की सबसे खूबसूरत कहानियां हैं। कहानीकार राधाकृष्ण सिर्फ झारखण्ड के गौरव नहीं हैं बल्कि वो हिंदी अदब के चमकते हुए सितारे के रूप में पूरे देश के गौरव हैं।

सत्र के पहले वक्ता प्रो. इंद्र कुमार चौधरी ने कहा हिंदी कि अदब के कोयले के खान में हीरे के समान थे अफसाना नवीस राधाकृष्ण। वो एक कहानीकार, पटकथा लेखक, सम्पादक और साथ ही साथ सामाजिक तहरीक से जुड़े हुए व्यक्ति भी रहे। दूसरे वक्ता प्रो. अशोक प्रियदर्शी ने अपने जीवन के संस्मरण याद करते हुए कहा कि जब राधाकृष्ण जी को बिहार सरकार की सरकारी पत्रिका और एक आदिवासी पत्रिका में से किसी एक में संपादक बनने का मौका मिला तो उन्होंने आदिवासी पत्रिका को चुना। उनके भीतर हिंदी साहित्य के लेखक होते हुए भी जनजातीय भाषाओं को लेकर निस्वार्थ प्यार था। उनकी लेखनी में आदिवासी किरदारों का चित्रण जितना मार्मिक और करुणता से किया गया है वो आज के आदिवासी लेखकों की लेखनी में भी नहीं मिल पाता।

दूसरा सत्र विजय गौड़ के उपन्यास “आलोकुठी” पर केन्द्रित रहा। इस सत्र में प्रमोद कुमार झा, रश्मि शर्मा, राकेश कुमार सिंह वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। उपन्यास पर बोलते हुए रश्मि शर्मा ने कहा किसी भी कृति के बारे में ये बात महत्वपूर्ण होती है कि वो समाज के किस धड़े के साथ खड़ा है, जुल्म करने वाले शासन वर्ग के साथ या फिर जिन पर जुल्म ढाया जा रहा हो उस दबे कुचले समाज के साथ। ये उपन्यास बंगाल विभाजन के बाद की आदिवासी नरसंहार की सच्ची घटना को बहुत ही मार्मिकता से बयान करती है।

प्रमोद कुमार झा ने कहा कि इतिहास से बाहर कर दिए गए वीभत्स घटना को साहित्यिक कृति के जरिए लेखक विजय गौड़ ने दुनिया के सामने लाने का प्रयास किया है। आलोकुठी उपन्यास विभाजन के दर्द और विस्थापन के दंश का उपन्यास है।
राकेश कुमार सिंह ने उपन्यास का आलोचनात्मक विश्लेषण करते हुए कहा कि इसमें सभी पात्र काफी रोचक हैं,मगर लेखक का बंगाली समाज से न होना उनकी भाषाई कमी को दर्शाता है।

किताब उत्सव के पांचवें दिन का तीसरा सत्र ‘आदिवासी समाज से हम क्या सीख सकते हैं?’ विषय पर केन्द्रित रहा। इस सत्र में डॉ. इकिर गुंजल मुंडा, रवि भूषण और राकेश रंजन उरांव ने विषय पर सारगर्भित वक्तव्य दिया। पहले वक्ता डॉ. इकिर गुंजल मुंडा ने कहा कि आदिवासी दर्शन में कोई सर्वशक्तिशाली देवता नहीं, यहां सभी का समान महत्व है। आदिवासी समाज में हाशिए में पड़े लोगों को भी समान स्थान मिलता है।

दूसरे वक्ता प्रो. रवि भूषण ने कहा कि आदिवासियों की खासियत है सादा जीवन और उच्च विचार। हमें आदिवासी समाज से सहजता, सरलता, सामुदायिकता और सहजीविता सिखने की आवश्यकता है। अंतिम वक्ता राकेश रंजन उरांव ने आदिवासी समाज की संरचना को विभिन्न स्तरों पर देखने का प्रयास किया।

कल 23 दिसंबर को कार्यक्रम के ‘हमारा झारखंड हमारे गौरव सत्र’ में फादर कामिल बुल्के को याद किया जाएगा। दूसरे सत्र में मल्ली गांधी की पुस्तकों के लोकार्पण के साथ ही ‘विमुक्त जनजातियाँ : हाशिए की अनसुनी आवाजें’ विषय पर बातचीत होगी। वहीं तीसरे सत्र में ‘आदिवासी साहित्य की भाषिक संरचना’ विषय पर परिचर्चा होगी।

NEWS ANP के लिए रांची से V SIngh की रिपोर्ट..