आसनसोल(ASANSOL):महोत्सव के दिन बंगाल के इस मंदिर मे विराजमान श्री कृष्ण और राधा रानी को पुष्प स्नान कराने की है परंपरावर्षों पुरानी परंपरा को निभाने के लिए हजारों की संख्या मे उमड़ी भक्तों की भीड़ ने करीब 800 किलो फूलों से कराया राधा गोविन्द को पुष्प स्नान आसनसोल, रंगों का त्योहार होली आज पुरे देश मे बहोत ही धूमधाम से मनाई गई, लोगों ने आपसी भाईचारगी को बनाए रखने के लिए एक दूसरे को रंग और ग़ुलाल लगाकर हंसी ख़ुशी इस त्योहार को मनाया, कहीं रंग और ग़ुलाल से लोगों ने होली खेली तो कहीं फूलों तो कहीं पानी से ही रंगों के इस त्योहार को मनाया.
ऐसे मे हम पश्चिम बंगाल के आसनसोल की अगर बात करें तो यहाँ बर्णपुर बाड़ी मैदान इलाके मे स्थित वर्षों पुराना राधे कृष्ण की एक प्राचीन मंदिर है, वैसे तो आए दिन इस मंदिर मे पूजा याचना करने के लिए भक्तों की भीड़ होती है, पर भक्तों की भीड़ होली के दिन दोगुनी और तीनगुनी हो जाती है, होली महोत्सव के मौके पर इस मंदिर परिसर मे हजारों हजार की संख्या मे भक्तों की उमड़ी भीड़ ने करीब 800 किलो फूलों से भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी को पुष्प स्नान करवाया वहीं भक्तों की भीड़ को सँभालने के लिए मंदिर परिसर मे पुलिस की सहायता लेनी पड़ती है, वह इस लिए की इस राधा गोविन्द मंदिर से सुबह विशाल दोल यात्रा निकाली जाती है.
लोग राधा कृष्ण की मूर्ति को लेकर दोल यात्रा मे निकालते हैं, सांस्कृतिक गाने व नृत्य के साथ महिलाएं और युवती पिले रंग की साड़ी पहनकर प्लास के फूल के बने आभूषण पहनकर इस दोल यात्रा मे शामिल होकर भगवान श्री कृष्ण और राधा की भक्ति मे चूर नाचती और झुमती जाती हैं, दोल यात्रा मे शामिल महिला भक्तों की अगर माने तो होली के मौके पर उनके द्वारा निकाला गया यह दोल यात्रा दोल पूर्णिमा के तौर पर मनाया जाता है, जो दोल पूर्णिमा राधा कृष्ण की प्रेम कथा से जुड़ा है, इस किए उनके द्वारा मनाया जा रहा यह त्योहार भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी को समर्पित है.
उनकी अगर माने तो दोल और होली एक ही त्योहार है लेकिन यह त्योहार अलग -अलग हिंदू पौराणिक कहानियों पर आधारित है, बंगाल मे दोल भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी पर केंद्रित है तो वहीं होली भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद की कहानी पर आधारित है, इस लिए बंगाल मे दोल पूर्णिमा पर्व के दौरान दोल यात्रा निकाली जाती है. इस दिन राधा कृष्ण की प्रतिमा डोली में स्थापित करके भक्त भजन-कीर्तन करते यात्रा निकालते हैं.
जुलूस शंखनाद, तुरही बजाने, जीत या खुशी के नारे और “होरी बोला” की आवाज के साथ आगे बढ़ता है. पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने राधा के प्रति अपना स्नेह व्यक्त किया था. इसलिए लोग कृष्ण और राधा के पुनर्मिलन का जश्न उनकी सजी हुई मूर्तियों को झूलती हुई पालकी में घुमाकर मनाते हैं, दोल याता को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी देखा जाता है.
NEWS ANP के लिए आसनसोल से अमरदेव की रिपोर्ट…
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